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Mohanjeet Kukreja

Others


5.0  

Mohanjeet Kukreja

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पता नहीं...

पता नहीं...

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जिस्म यहाँ ज़रूर है, ख़ुद कहाँ है पता नहीं

धड़कन मौजूद है, दिल कहाँ है पता नहीं !


महफ़िल में चल रहा है, दौर गुफ़्तगू का...

सुन तो रहा है, तवज्जो कहाँ है पता नहीं !


गले में टांग रखी है पते की एक तख़्ती सी

बेख़बरी का आलम, रहता कहाँ है पता नहीं !


होता है यहाँ हर रोज़... मैकदे के खुलते ही

बंद होने पे मगर, जाता कहाँ है पता नहीं !


बहुत सी हसरतों को गला घोंट कर मारा है

इतनी लाशों को दफ़्नाता कहाँ है पता नहीं !







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