STORYMIRROR

आलोक कौशिक

Others

4  

आलोक कौशिक

Others

प्रकृति

प्रकृति

1 min
726

विध्वंसक धुंध से आच्छादित 

दिख रहा सृष्टि सर्वत्र 

किंतु होता नहीं मानव सचेत 

कभी प्रहार से पूर्वत्र।


सदियों तक रहकर मौन 

प्रकृति सहती अत्याचार 

करके क्षमा अपकर्मों को 

मानुष से करती प्यार।


आता जब भी पराकाष्ठा पर 

मनुज का अभिमान 

दंडित करती प्रकृति तब 

अपराध होता दंडमान


पशु व पादप को धरा पर 

देना ही होगा उनका स्थान 

करके भक्षण जीवों का 

नहीं होता मनुष्य महान।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन