STORYMIRROR

swati Balurkar " sakhi "

Others

2  

swati Balurkar " sakhi "

Others

परिणय

परिणय

1 min
139

परिणिता बन तुम्हारी

इस घर में पधारी थी!

सबकुछ नया था यहाँ

घर गृहस्थी और तुम भी तो!


यह था अनजान सफर

मुझ जैसी साक्षर महिला के लिये!

लाड प्यार सब छोड़ आयी थी

सब कुछ नया तुम्हारा स्वभाव भि तो!


तौर तरीके, खान पान था

अलग और हट के, बेमेल सा लगे!

अनजान सफर तुम्हारे परिवार का

मैं नये मुसाफिर सी, तुम्हारा भाव भी तो !


पर्व त्योहार मनाने लगे जब

खिली दिल की कली मेरे

उत्साह सा भरा तन मन में क्योंकि

हमराही तुम थे, प्यार तुम्हारा भी तो !



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन