फोटो
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हाथ लग गई बचपन की फोटो,
मिले कई लम्हें मुस्कुराते हुए।
याद आ गए पुराने दोस्त,
एक दूजे को गले लगाते हुए।
याद आया गुजरा वह जमाना,
हो रहा था खुशियों का अहसास।
दृश्यमान हुए बचपन के लम्हें,
हो रहा था सुकून का आभास।
याद आ गए स्कूल के पल,
गेट पर खड़े वाइस प्रिंसिपल।
मरोड़ देते थे हाथों से कान,
अगर दिख जाते लंबे बाल।
याद आ गई सारी शैतानियां,
नादानियां भी शरमा उठी।
घंटों खड़े रहते थे बेंच पर,
क्लास टीचर की खाते थे लाठी।
वह बाहर लटकता हुआ घंटा,
कभी खुद ही बजा देते थे।
अगर मालूम होता चौकीदार को,
मार भी तो उनकी खाते थे।
कभी भूल जाते थे कॉपी किताब,
बन जाते थे मुर्गा क्लास में।
कांपते थे थर थर क्लास में,
खड़ी जब रहती टीचर पास में।
स्कूल से घर तक पैदल आना,
कभी दोस्तों के घर चले जाना,
कभी दोस्तों को घर ले आना,
बड़ा सुहाना था यह ताना बाना।
घंटों बैठे रहते थे नदी किनारे,
मसाले वाली जलपाई खाते रहते।
कभी खाते रहते संतरे की फांक,
दोस्तों संग घंटों बतियाते रहते।
कबड्डी खेलते थे हा डू डू,
कभी खेलते थे खो खो खो।
कभी खेलते गुल्ली डंडा,
अस्सी, नब्बे, पूरे सौ।
कभी दिनेश सर की लाठी,
कभी नूरुल सर का चांटा।
याद आती है कक्षा पांचवी,
किसी ने किसी का कान था काटा।
मुसीबतें ही मुसीबतें थी,
इतनी सुविधाएं तो नहीं थी।
पर था एक मस्ती का आलम,
बड़ों की हिदायतें भी बहुत थी।
भाड़े के घर में रहते थे,
दादाजी के संग सोते थे।
कुएं से पानी निकाल निकाल,
खुले में बाल्टी से नहाते थे।
कमियां जीवन में बहुत थी,
मगर जिंदगी में सुकून बहुत था।
आज जैसी चिक चिक न थी,
चाहतों का अरमान बहुत था।
दादा दादी का स्नेह अपार था,
माँ का भरपूर दुलार भी था।
आँखों में शर्म का परदा था,
पिता की आँखों का डर बहुत था।
दादी बनाती जाती गुलाब जामुन,
खाते थे हम पांचों घूम घूम।
इतने स्वाद होते थे गुलाब जामुन,
दादी को हम लेते थे चूम चूम।
दादाजी को खाना परोसते,
आधा तो हम ही खा जाते।
हमारी हरकतों से परेशान होकर,
दादाजी भूखे ही उठ जाते।
रूठ जब जाता दादाजी से,
महीनों नहीं करता था बात।
फिर दादाजी से सुलह हो जाती,
देते जब मुझे दस का एक नोट।
फिर गए हम नए घर में,
कमरे थे सब के अलग अलग।
बचपन का था तब भी आलम,
पुराना घर याद आता जब तब।
बड़े भैया की हो गई शादी,
बहन की भी उठ गई डोली।
मैं भी आ गया दूसरे शहर,
खाली हो गई बचपन की झोली।
कॉलेज की जिंदगी थी अलग,
नए दोस्त भी कुछ बन गए।
छूट गया था बचपन का आलम,
बचपन के तराने बिखर गए।
पढ़ाई पूरी कर ली जब मैने,
हो गई शादी दो साल के अंदर।
कुछ अनकही घटनाएं हो गई,
घुटने लगा था मन के अंदर।
किसी ने मुझे लिया संभाल,
टल गया सारा झगड़ा और बवाल।
क्यूँ हुए घर में सब नाराज,
आज भी उठता मन में सवाल।
जिन्दगी यूँही गुजरती गई,
जिम्मेदारियां भी बढ़ गई बहुत।
दो बच्चों को पालना था,
परेशानियां भी तो थी अकूत।
समय की चोट लग ही गई,
बीमारी खा गई पूरा शरीर।
किसी की मन्नतों ने बचा लिया,
अपने पराए की हो गईं तासीर।
जिन्दगी यूँही चलती रही,
पिताजी का हो गया देहांत।
लगता था बहुत अकेलापन,
हो गया एक युग का अंत।
बच्चे बड़े हो गए अब तक,
सबकी अपनी पसंद नापसंद।
हो जाती अब तो अनबन,
कुछ न हो जो उनका मनपसंद।
याद करता हूँ जब बचपन के दिन,
एक टीस सी उठ जाती मन में।
सब कुछ हैं आज जिंदगी में,
बहुत कुछ फिर भी छूटा जीवन में।
मन करता, फिर पा जाऊँ बचपन,
पालूँ फिर बचपन के वो लम्हें।
जीलूँ जिंदगी फिर एक बार,
जीलूँ फिर बचपन के सब लम्हें।
वापस पाऊँ वह खोए रिश्ते,
लौटा लाऊँ बचपन की मस्ती।
पा जाऊँ वह बचपन का शहर,
चलाऊँ फिर से कागज की कश्ती।
ऐसी बहुत हैं बातें अनकही,
बन जायेगी पूरी किताब।
क्या लिखूँ और क्या छोड़ दूँ,
मिला नहीं इस बात का जवाब।
