STORYMIRROR

Rajiv Jiya Kumar

Others

4  

Rajiv Jiya Kumar

Others

ओस की बूूंद(1)============

ओस की बूूंद(1)============

1 min
295

कोमल रंगीन पंखुड़ियों पर सजे पुष्प के 

बूूंदे ओस की आभा अद्भूत बिखेेेेरती हैं

क्या है बिखरा धरा पर सब जीवन 

छवि उसकी बङी सहजता से उकेरती हैं।।


        एक लङी श्वेत मोतियों की दुुुुुुर्वा के

         तन पर बूूंदे ओस की बिछी दिखती हैं

        इसी उपलब्ध पटल पर ये सब 

        हर शै,संबंंध, सूक्ष्म संयोजन की

        अनुपम गाथा भी लिख जाती हैं।।


इन बूूंदों की गजब चमक संकेत नवजीवन के

पल पल हर पल गुुन गुन कर बुनती हैैं

आगे कङी धूप मेें सूरज के तो फिर 

तप तप कर लुुुप्त सब ये हो लेती हैं।।


         एक नेमत यह मिला जो जीवन है

         लुुुप्त होने से पहले तप जीवन धूप मेें

         परिवेश अपना निखार ले जीव तुुुम

         संदेेश यही दे ओस की बूूंदें 

         वादा कर आने की अगले दिन 

         सजीली प्रकृति में गुम हो लेती हैैं।।


ओस की बूंदों की यह कलाकारी

सोच को सीख देती प्रतिदिन न्यारी 

धरा पर बिखरा सब तेरा पर तू नश्वर है

सजा ओस की बूूंदों की तरह धरा को

न कर दंभ,दर्प,गुुुरूर मिलना तो धरा में ही है।।

          



Rate this content
Log in