नदी की आत्मकथा
नदी की आत्मकथा
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नदी की आत्मकथा
समंदर में मिलकर
होती है मुकम्मल,
उद्गम से संगम तक
कभी प्रवाह तो कभी ठहराव
आते हैं तमाम उतार-चढ़ाव,
कुलांचे भर बहते रहना
सुंदर स्वर में कल कल कहना
नियति के साथ बहकर
खुद का अस्तित्व भूलकर
समंदर में समा जाना!
