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अच्युतं केशवं

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अच्युतं केशवं

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मूक पशु भी समझते

मूक पशु भी समझते

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मूक पशु भी समझते, जहाँ प्रेम की भाषा

द्वेष अंध वंचित रहें, मिले न प्रेम प्रकाश


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