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Bhawna Kukreti Pandey

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Bhawna Kukreti Pandey

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मन केतली

मन केतली

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मन की केतली

को मैं कभी समय की 

आँच पर नहीं रखती,

वह मेरे प्रेम की 

गंगा जली है।


कड़वाहट की धूप में प्रेम

भाप बन कर न उड़ने लगे इसलिए

केतली का ढक्कन अब बंद रखती हूं।


उसकी शीतलता का 

अहसास करने के लिए,

बार बार जी उठने के लिए,

दो घूंट पीने के लिए,

अतीत के निजी कमरों में जाती हूँ

टटोलती हूँ ,सजग हो कर।


मैंने वहीं

कहीं

बड़े जतन से

अपने मन की केतली को

भटकते संतप्त हृदयों से

बचा कर ,छिपा कर रखा है।


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