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Chandresh Kumar Chhatlani

Others

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Chandresh Kumar Chhatlani

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मेरा सफ़र

मेरा सफ़र

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बारिशों में चलता गया मैं

अपने हौसलों की छतरी को थामे.

झाड़ियों से निकलते हुए

बचता-बचाता उन साँपों से जो झाड़ियों की आस्तीनों में पलते हैं.

रास्ते के पत्थर भी हो रहे थे चिकने - हो के गीले,

मुझे डर था कि फिसल ना जाऊं

लेकिन मर्यादाओं से बने हुए जूते मज़बूत थे.

मुझे मेरे कामों का मूल्य पता था,

इसलिए रुका नहीं - गीता के श्लोकों की ऊर्जा साथ थी.

और आखिर,

पहुँच ही गया मंज़िल पर

साफ़ हो गया आसमान भी 

और मैं देखता रहा 

काले से नीले तक का सफर।


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