STORYMIRROR

Vishwa Prakash Gaur

Others

3  

Vishwa Prakash Gaur

Others

मैं

मैं

1 min
170

मैं शहर दर शहर बस भटकता रहा,

मन की तृष्णा वहीं की वहीं रह गई। 

हाट में मोल दर मोल होता रहा,

मेरी अपनी चमक फीकी सी रह गई।

हौसले मेरे फौलाद जैसे मगर,

उम्र नदियां के पानी सी बह बह गई।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन