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Kavita Patel

Others

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Kavita Patel

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मैं कविता हूं

मैं कविता हूं

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मैं मन का भेद हूं,

मैं दिल का दर्द हूं।


मैं रसों का श्रृंगार हूं,

मैं भाव का रूप हूं।


मैं साहित्य की जननी हूं,

मेरा कोई प्रारंभ नहीं और न ही कोई अंत है ।


मैं दिलों को जोड़ कर रखती हूं,

मैं समय काल हूं।


मैं संसार हूं,

मैं पुष्प सी अभिलाषा हूं।


आनंत काल तक पढ़ा जाएगा,

 मुझको मैं वह कविता हूं।


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