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Sunil Kumar

Others

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Sunil Kumar

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मां

मां

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बच्चों की भूख मिटाने को खुद भूखी रह जाती है

चैन की नींद सुलाने को खुद कांटो पर रात बिताती है

वो मां है जो बिना स्वार्थ अपना फर्ज निभाती है।


अंगुली पकड़कर बच्चों की चलना जो सिखाती है

भले-बुरे का भेद बता कर जीवन राह दिखाती है

वो मां है जो बिना स्वार्थ अपना फर्ज निभाती है।


धूल सने बेटे को भी जो चंदा- सूरज बताती है

लाख खता करले बेटा सीने से उसे लगाती है 

वो मां है जो बिना स्वार्थ अपना फर्ज निभाती है।


घिर आते जब दुःख के बादल सुख की बूंदें बरसाती है

घर-आंगन में सदा ममता के मोती लुटाती है

वो मां है जो बिना स्वार्थ अपना फर्ज निभाती है।


बो करके संस्कार बीज जीवन बगिया महकाती है

बच्चों को बनाने लायक सारा जीवन कष्ट उठाती है

वो मां है जो बिना स्वार्थ अपना फर्ज निभाती है।


जीते जी मां,ममता का कर्ज चुकाती है

मरते-मरते भी दुआ जीने की दे जाती है।



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