कवि का धर्म
कवि का धर्म
कवि का धर्म बता तो जानूं,
क्या लिखना क्या उचित नहीं है?
चलो..! सोचकर हमें बताना..!
तथ्य कहो पर, दो मत ताना।
क्या लिखना है श्रेयस्कर भाई,
प्रश्न पूछकर नहीं सताना।
मैं लिखता वह मन की भाषा,
पर तेरी है क्या अभिलाषा?
क्या तू चाहे पल - पल हमसे,
कवि की क्या समझें परिभाषा?
कवि का कर्म बता तो जानूं,
क्या लिखना क्या उचित नहीं है?
तू कहता ! सच आगे लाना,
लेखन का कर्तव्य यही है।
जन-जन को सत-पथ ले जाना,
तेरा तो गंतव्य यहीं है।
माना मैंने बात सही है,
मेरा भी मंतव्य यही है।
किन्तु लिखना सत्य सरासर
आज के युग रंतव्य यहीं है।
कवि का मर्म बता तो जानूं,
क्या लिखना क्या उचित नहीं है?
मैं लिखता, बस लिखता जाता,
लेकिन तू पढ़ता ही कब है?
मान लिया पढ़ता भी होगा,
पढ़ वैसा गढ़ता ही कब है?
सच लिखता मैं, थक जाता हूँ,
सत-पथ पर बढ़ता ही कब है?
मिथ्याचार बढ़ा चहूँ दिस में
मिथ्य सूली चढ़ता कब है?
कवि का कर्म बता तो जानूँ,
क्या लिखना क्या उचित नहीं है?
