कसक
कसक
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ना हो कोई गरीब मुझ सा
ना ही जिम्मेदारियों का पहाड़ सा हो
ना ही धूमिल हों मंजिलें उसकी
ना ही ख्वाहिसों का मलाल सा हो।
जब परवाह न हो किसी को उसकी
हर वक्त आसुओं का सैलाब सा हो
बेखबर है जिंदगी से जो
मौत का उसको इंतजार सा हो
बदनाम है जो पूरे शहर में
उसके मन में इक सवाल सा हो
सब तो हैं अपने यहां
पर उनपर कोई अधिकार सा हो
कैसा लगता है वो पल भी
जब अपना कोई अनजान सा हो
ना हो कोई गरीब मुझसा
ना ही जिम्मेदारियों का पहाड़ सा हो।।।
