कसक
कसक
1 min
269
ना हो कोई गरीब मुझ सा
ना ही जिम्मेदारियों का पहाड़ सा हो
ना ही धूमिल हों मंजिलें उसकी
ना ही ख्वाहिसों का मलाल सा हो।
जब परवाह न हो किसी को उसकी
हर वक्त आसुओं का सैलाब सा हो
बेखबर है जिंदगी से जो
मौत का उसको इंतजार सा हो
बदनाम है जो पूरे शहर में
उसके मन में इक सवाल सा हो
सब तो हैं अपने यहां
पर उनपर कोई अधिकार सा हो
कैसा लगता है वो पल भी
जब अपना कोई अनजान सा हो
ना हो कोई गरीब मुझसा
ना ही जिम्मेदारियों का पहाड़ सा हो।।।
