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VIKAS KUMAR MISHRA

Others

5.0  

VIKAS KUMAR MISHRA

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कर मर कर भर

कर मर कर भर

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मेरे रुपये की अठ्ठन्नी

पहले कहलाती लगान थी!

आम भाषा में इसे

अब कहते 'कर' हैं!


कर भी वो देगा

जो करता है!

उनके लिए जो कुछ

नही करते हैं!


चाहो तो खुश हो लो

ये सुनकर के नागरिक

जिम्मेदार हो!

बकरे तो बली के

खुद ही हो

खुद को चाहो तो

पुचकार लो!


फिर किसी ने पूछा।

की भैया ये सेस क्या है?

हमने भी कहा कि-

एक तकनीकी शब्द है।

दिमाग से परे, फटी जेब

और काट जाने को


हमने तो सरकारें चुनी

कुछ राहत पहुँचाने को।

सरकार ने हमें चुना

कर पर कर लगाने को!


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