कोमल फूलों जैसे रिश्ते
कोमल फूलों जैसे रिश्ते
खुशबू देते कोमल फूलों जैसे रिश्ते।
ना जाने क्यों आज हो गए काँटे रिश्ते।
पलकों पर पलते थे, रहते थे जो हिय में
ठोकर खा अब वही पड़े पैताने रिश्ते।
सहलाते थे दर्द दिलों का मरहम लाकर
अब महरूम हुए हाथों से गहरे रिश्ते।
खिल जाते थे नैन चार होते ही जो कल
नैन मूँद बन जाते अब, अनजाने रिश्ते।
बूँद-बूँद से बरसों में जो हुए समंदर
बाँध पलों में तोड़ बने बंजारे रिश्ते।
हरे भरे रहते थे भर पतझड़ में भी जो
अब सावन में भी दिखते हैं सूखे रिश्ते।
तकरारों में पूर्व बनी माँ, पश्चिम बाबा
सुपर सपूतों ने कुछ ऐसे बाँटे रिश्ते।
नादानी थी या शायद धन-लोभ “कल्पना”
गाँव-गली से बिछड़ गए जो प्यारे रिश्ते।
