कोई हलचल तो हो
कोई हलचल तो हो
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गुजरते हुये समय की
हलचलों पर नजर रखने वाले,
और उन हलचलों को
शब्द देने वाले लोग
होश में आयें।
देखिये हर जगह नकारात्मकता
प्रभावी है
राजनीति में
धर्म में
और सामाजिक गतिविधियों में।
ये यूँ सक्रिय है जैसे ये
सकारात्मक है
पर है नकारात्मक।
सोचिए जो नहीं है
उसे होने जैसे प्रायोजित किया जा रहा है
और जो है वो निष्क्रिय है
मतलब राजनीति निष्क्रिय है
अगर सक्रिय है तो
उसमें सकरात्मकता कहाँ है
जीवन के प्रति मानवीय
दृष्टिकोण कहाँ है
संविधान की मर्यादा कहाँ है।
इस नकारात्मकता के विरुद्ध
सकारात्मक हलचल तो हो
आखिर हम मनुष्य हैं
हमारे पास विवेक है
समझ की शक्ति है
इनका उपयोग सम्भव है।
