STORYMIRROR

Mayank Kumar

Others

2  

Mayank Kumar

Others

कलंक

कलंक

1 min
205

कितने ख्वाब देख कर हम जिंदगी को बुनते हैं,

 मानो मकरे के जाल में हम भी रहते हैं 

जिंदगी में हमें ना जाने कितने ऊंचाई मिलती है 


 तभी तो हम नव और हिमालय की बात करते हैं 

संसार में जब- जब संचार उत्पन्न होती है 

विपदा , कलंक उस व्यक्ति के साथ रहती है ।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन