कल और आज
कल और आज
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पढ़ मानुष अपना इतिहास
बन जाए न अब परिहास ।।
एक समय था जब मानव,
रहते थे पेड़ पौधों बीच ।
आकर्षण प्रकृति का,
पल-पल लेता पग को खींच।।
हरियाली उपवन की कहती,
दे यह हर मन को हर्ष ।
युग बीता, चक्र बदला,
बदलने लगे संग में वर्ष।।
ऊँची मीनारों वाले,
वृक्षों से अब दूर हुए।
काटे घने जंगल, खोए पंछी,
जो प्रकृति के थे नूर हुए ।।
भौतिकता का कर उपयोग,
लगा देह में अनेकों रोग।
सुख-साधन का ये उपभोग,
किये दूषित सागर को रोज।।
