किसे लिखूं
किसे लिखूं
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किसे लिखूं क्या कहूं
अनकहे शब्दों की किताब मेरे अंदर है
वो किसे पढ़ने को कहूं मैं
अपने अल्फाज़ जिसके
लोगों ने मायने बदल दिए,
उनके मतलब किसे लिखूं मैं..
एक किताब जो पूरी होते हुए,
भी अधूरी सी है
किसको वो किताब पढ़ने को कहूं मैं
अभी कोरे कागज बाकी है
कैसे इन पन्नों को भरूं मैं
थमी से ये धरा,ये आसमान है
कैसे अपने शब्दों से हलचल करूं मैं
अपनी अनसुलझी पहेली को,
किसे सुलझाने को कहूं मैं
कोई तो दे मेरे सवालों का जवाब
अनकहे शब्दों की क़िताब को
किसे पढ़ने को कहूं मैं।
