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बबिता प्रजापति

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बबिता प्रजापति

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जी करता है....

जी करता है....

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जी करता है कल्पना का

रच लूँ एक संसार,

प्रेम हो स्नेह हो

लोगों के ह्रदय में अपार।

कलकल करती नदियां

जल हो आरपार,

फूल फल से लदी

झुके तरु की डार।

नीलम सा अम्बर हो

हो तारों का अंबार,

खाट डाल के आंगन सोएं

हो ह्रदय की बातें हज़ार।

रक्ताभ हो रश्मिरथी

गिरी से हो उदगार,

चहुँ दिश पुष्पों से सजे

हो भ्रमरों का गुँजार।

कृष्ण नाम जपते रहें

हो देवालयों से उच्चार,

शंख घण्टे घड़ियालों से 

गुंजित हो घर द्वार।


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