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Garima Chourey

Others

5.0  

Garima Chourey

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है क्या ही घन ये सघन

है क्या ही घन ये सघन

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है क्या ही घन ये सघन!

तू सिंधु पोषित,

रव अल्प शोषित,

विद्यु क्यों तेरे अन्तस् में आक्रोशित,

क्या अपने पी को ही तू ढूँढे,

घूमे वन-वन!


नभ में आच्छादित,

करे तो आल्हादित,

नत अम्बर गर्वित,

क्यों ले के आभा तेरी झूमे,

आज तृण-तृण!


चहुँ दिशि में चँचल,

तू चलता प्रतिपल,

तेरी ही छाया हो कर

मैं आज श्यामल,

चलूँ सँग तेरे आज मैं,

जलधार बन-बन!


क्या हुआ सम्पूर्ण नभ ही,

मेघ-आलय!

तेरे आगे क्यों लघु शाश्वत ,

हिमालय!

कर दे हुलसित आज मन का,

ये शिवालय,

कर उठे नटराज मन मंदिर में नर्तन!

है क्या ही घन ये सघन!

              


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