गज़ल
गज़ल
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दर्द के बीच में हमदर्द ढूँढता हूँ
आजकल कांटों में छुपे फूल ढूँढता हूँ,
मिलते हैं तो कहते हैं तुमसा नहीं कोई
सामने से वार करने वाले दोस्त ढूँढता हूँ,
कितने गुलाबों ने दिये हैं ज़ख्म क्या पता
उजड़ी हुयी बगिया में एक पुष्प ढूँढता हूँ,
यूँ तो .....
लेकर हूँ चलता साथ साथ अपना पता मैं
पर ...
टूटे हुए शहर में एक घर ढूँढता हूँ।
