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गहरा रिश्ता

गहरा रिश्ता

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कागज और कलम का,

रिश्ता है, बड़ा ही गहरा।

गर डाल दो, लगन की स्याही,

अवसर मिलता है, बड़ा ही सुनहरा ।।


आत्मा न हो जिस में,

एक लब्ज भी, ठीक न उमड़ता है।

कलम का, बार बार, रूक जाना,

कागज पर की, लिखावट, न जानता है ।।


चाहत जो भरी, कूट कूटकर आत्मा में,

कलम से, झरने जैसी बहती है स्याही।

कागज पर की, पंक्तिया, बयाँ करती है,

छोड़ के अमिट छाप, खून की स्याही ।।


कलम में छिपी है ताकद बारूद की,

झलकती है, हर लब्ज से शायर की अमीरी।

लगा देते है रोक, सियासतदार कभी कभी,

फकीरी है, आत्मा से भी गहरी ।।


सुकून मिलता है शायर को, शायरी से,

कलम से उठी हुई, हर चिंगारी से कभी कभी।

बिजलीया गिरती है, शायर की आत्मा पर भी,

डरते नही, मौत को गले लगाने से कभी कभी ।।


अगर कागज न होता कलम,

किस पर चलती कहर ढाने को।

इन्कलाब के, नारे को हवा देती

खून की नदियाँ, बहाने को ।।


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