ग़ज़ल
ग़ज़ल
तू है न है निशाँ ही तेरा जब दयार में
पाए कोई भी कैसे मज़ा इस बहार में
उनसे मुहब्बतों के सिवा चाहिए न कुछ
चाहो तो ये कसम भी उठा लेंगे प्यार में
यूँ जो उठा के उँगलियाँ देते हो ताने तुम
देखो न जान लें ले कहीं अबकि बार में
इल्ज़ाम दे रहे हो पर इतना भी जान लो
तुम भी धुले नहीं हो किसी दूध धार में
वादा न तूने मुझसे किया होता गर सनम
शब कट ही जाती ये भी तिरे इंतज़ार में
मिलने की है ख़ुशी तो बिछड़ने का ग़म भी है
अच्छी लगे न बात ये इस प्यार व्यार में
कैसे दिया करूँ मैं दिलासा तलब को अब
नज़रें रहीं न दिल ही मेरे इख़्तियार में
मिलने का था यक़ीन हमें इस क़दर के हम
तुझसे बिछड़ के जीने लगे ऐतबार में
‘दीपक’ सिवाय दिल के नहीं अब कोई मेरा
कोई कमी नहीं है इस इक ग़मगुसार में
