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Jyoti Agnihotri

Others

5.0  

Jyoti Agnihotri

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फ़िर ज़िन्दगी

फ़िर ज़िन्दगी

1 min
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अतीत के दुःखते ज़ख़्मों पर ,

अब वक़्त की धूल जमने लगी है।

लगता है शायद अब फ़िर ज़िन्दगी,

अपनी ही रफ़्तार से चलने लगी है।


वेदना भी संवेदना- सी रोयी थी,

जब उन निःशक्त- निःशब्द सिसकियों ने,

धीमे-धीमे सदियों-सी बंधी गाँठें,

अपने ही बेजान हाथों से खोली थीं।


स्मरण-विस्मरण सब जीवन चरण,

इस हास्य-रुदन-जीवन-मरण ,

से भी है परे इस जीवन का उपक्रम।


अतीत के दुःखते ज़ख़्मों पर ,

अब वक़्त की धूल जमने लगी है।

लगता है शायद अब फ़िर ज़िन्दगी,

अपनी ही रफ़्तार से आगे बढ़ने लगी है।



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