STORYMIRROR

Rekha Bora

Others

3  

Rekha Bora

Others

द्वंद

द्वंद

1 min
189

दुःख का

भयावह साया

घेरने लगा है

खुशी मेरी

और भी

सिमट गयी है

भय से आशा की

क्षणिक किरण


कैसे निकल सकूँगी

इस सख़्त खोल से मैं

दूर- दूर तक कहीं

कोई रोशनी नहीं

अंधेरे निगलने

लगे हैं मुझे

कैसे जी सकूँगी

इस अंधेरे उजाले में

मैं एक साथ !...


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन