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Rekha Bora

Others

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Rekha Bora

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द्वंद

द्वंद

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दुःख का

भयावह साया

घेरने लगा है

खुशी मेरी

और भी

सिमट गयी है

भय से आशा की

क्षणिक किरण


कैसे निकल सकूँगी

इस सख़्त खोल से मैं

दूर- दूर तक कहीं

कोई रोशनी नहीं

अंधेरे निगलने

लगे हैं मुझे

कैसे जी सकूँगी

इस अंधेरे उजाले में

मैं एक साथ !...


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