दस कहानियां
दस कहानियां
पूरे दस की टोली ,ये हमजोली ,खाते हिंगोली,
मेले में पहुंचे करते हंसी ठिठोली
कोई नाटा कोई लम्बा ,कोई पतली ,कोई गोली -मोली
चखकर बन्दर -मदारी के तमाशे का स्वाद और माथे पर आनंद की टीका -रोली
देख बड़ा सा हिंडोला ,
नो का तो मन डोला पर
एक का हुआ डर से सब अंदर से खोखला
सबके बस्ते -रुमाल थामे खड़ा रहा वो एक कोने
फुलाकर मुँह अकेला ,
कहावत के आंकड़ों ने ली करवट पहली बार
पड़ा भारी देहले पर नेहला
अब पूरे नौ की टोली ,
ओढ़े चोंगा लुत्फ़ का झूले पर
करते नवरस का श्रृंगार ,बैठे सब ठाट -बाट
ऊटपटांग झूले में होकर सब उलटे -पुल्टे,
हुए मुस्कान के अनुकूल
औंधा हुआ बस एक प्रतिकूल ,
जी मचलाकर नहलाया सभी को
उसके अमाशय के खनिज पदार्थों की ये भूल
सुलाकर उसे घने पेड़ की छाँव ,
हुए आठ से सात वो महकते चमन के तरुण फूल।
