दर्द
दर्द
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हल्की-फुल्की सी है ज़िन्दगी
इतना दर्द से हमदर्दी क्यूँ रखते हैं
दर्द महसूस हो पाता है
बाकी असर अंजान लगते हैं
किसी के होना चाहते हैं
दर्द के ज़रिये
किसी के होने के पास लगते हैं
तनहाई में यादों से गुज़र आएँ
आँखों में छलके जाम लगते हैं
दर्द में खुद पे रहम-दिली
अमूमन इकदाम नाकाम लगते हैं
अधिकतर तथ्य वही है
मुकरने के खयाल बे-बुनियाद लगते हैं।
