दम्भ का धुँआ
दम्भ का धुँआ
ये जो धुआँ है
जलते हुये दम्भ का है
और वो दम्भ है
दम्भ को जलाने वाले का।
दम्भ बुरा होता है
चाहे जलने वाले का हो
चाहे जलाने वाले का हो।
एक जजबाती वायरस की तरह
ज़हन में प्रवेश करता है
और वो सब कुछ
जलाकर खाक कर देता है
जिस पर आदमी दम्भ होता है।
दम्भ चाहे रूप का हो
शक्ति का हो
सौंदर्य का हो
चाहे किसी विशिष्टता का हो।
वो हालात प्रकट होता ही है
आदमी की तरह
जो उस दम्भ को
निष्प्रयोज्य बनाने का
प्रबंध करता है।
प्रकृति का नियोजन
बिना किसी आदमी के
कभी पूर्ण हो, मुमकिन नहीं है
एक बहाना भर होता है आदमी।
प्रकृति तो यही है न
जो है उसे नष्ट होना है
बदलाव एक रेखा है
दम्भ होने और उसके टूटने के बीच।
अगर जीवन को
जीवन की तरह जिया जाये
तो ये न तो उगेगा, न टूटेगा।
यकीनन जीवन समाधान है
युग की समस्याओं का
क्योंकि ये सिर्फ उस आदमी
का नहीं होता
जो जीता है
उसका भी होता है
जो देता है जीवन।
ये होश की बात है
हर जीने वाले की
किसी को होता है
किसी को नहीं आ पाता है होश।
