धूप
धूप
1 min
357
मेरे आँगन को
स्लेट बनाकर
रोज़ अंजुली भर धूप
की स्याही से
अंकित कर देता है
सुनहले अक्षरों को
मढ़कर प्रेम…!
मैं करती हूँ श्रृंगार
अक्षर दर अक्षर
उन स्वर्ण आभूषणों का
और करती हूँ संवाद
उस अनजाने ओज से
जो देता है आभास
कि प्रभा की हर आभा
चमकी है सिर्फ मेरे लिए
उन प्रेम भरे हाथों की
लकीरों से गुज़रकर
आयी है ये सुनहली धूप.
