धरती माँ का प्रकोप
धरती माँ का प्रकोप
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सिमटता संसार,
पृथ्वी का घटता आकार
हम सबका है विकार
जनसंख्या की बोझ से,
मानव के भौतिक उहापोह से।
करती है जब भी प्रतिकार
प्रलय का तब मिलता है उपहार।
अपने ही बनाए नियम
फिर कहा हम में संयम
भौतिकता का लिए अभास
धरती का हरपल हास्।।
मानव ही मानव को
निगलने को कर रहा विचार
सिमटता संसार,
पृथ्वी का घटता आकार
हम सबका है विकार
देह को नोचते,
खाते बड़े चाव से हम।
शर्म नहीं जरा हमें
किया धरा को नग्न हमने
नवीनता का रस पीते हम
अपने ही बनाये नियम, फिर कहाँ हमें संयम
करती है जब भी प्रतिकार
प्रलय का तब मिलता उपहार
सिमटता संसार,
पृथ्वी का घटता आकार
हम सबका है विकार।
