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Vishal Vaid

Others

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Vishal Vaid

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डर लगता है

डर लगता है

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मुझको अब अपनों से डर लगता है

मकान दुश्मन का अब घर लगता है 


उसने चाहा था मुझको दिल से कभी

ये सोच बादलों में सर लगता है


तेरे सब अश्क है सागर से गहरे

लेकिन सागर कतरा भर लगता है


ज़रा सलीके से चलाओ तुम खंजर

कभी इधर तो कभी उधर लगता है


वो फिर से कर रही है इश्क की बातें

मुझे फिर दिल टूटने का डर लगता है


खुद से ही मुहब्बत ,खुद से ही शिकवा

ये बंदा तो आत्म निर्भर लगता है


भेजे है शेर दो मैसेज में उसने

मेरी शायरी का ये असर लगता है


कुछ बूंदे छूटी होगी मंथन में

सागर में नीला सा ज़ह्र लगता है


सब देख रहे है राह मसीहा की

और वनवास में है रघुवर, लगता है


जिस दर पे मिले भूखे को दो रोटी

बस वही उसे रब का दर लगता है


जब आती है आवाज़ परिंदो की

तब सच में शजर , शज़र लगता है।


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