चाय सी जिंदगी
चाय सी जिंदगी
1 min
208
मन भटक रहा है इधर उधर
जैसे कोई बच्चा माँ से
बिछड़ गया हो भीड़ भरे
बाजार में
एक उम्र बीत गयी ,
मेरा वक्त नहीं आया अब तक
जिंदगी बहुत पीछे खड़ी है
जैसे किसी लम्बी कतार में
सुनो, तुम चाय पर आते
रहना अपनी टेबल पर
क्या पता! मैं मिल जाऊं
सुबह के अखबार में!
