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Shiwani Kumari

Others

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Shiwani Kumari

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चाय सी जिंदगी

चाय सी जिंदगी

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मन भटक रहा है इधर उधर

जैसे कोई बच्चा माँ से

बिछड़ गया हो भीड़ भरे

बाजार में


एक उम्र बीत गयी ,

मेरा वक्त नहीं आया अब तक

जिंदगी बहुत पीछे खड़ी है

जैसे किसी लम्बी कतार में


सुनो, तुम चाय पर आते

रहना अपनी टेबल पर

क्या पता! मैं मिल जाऊं

सुबह के अखबार में!



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