बूढ़ा बरगद
बूढ़ा बरगद
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ना मालूम
कहानी कितनी दफ़न वक़्त के सीने में।
हर इक आता - जाता लम्हा,
नई कहानी कह जाता है।
ना जाने,
कितने ही लम्हे आए,
आकर गुजर गए।
देख रहा है बूढ़ा बरगद,
हर आते जाते लम्हे को।
कहीं गाँव के कोने में,
सूनी सी इक पगडंडी पर,
जाने कितने वर्षों से वो,
बस यूँ ही चुपचाप खड़ा है।
गिनता रहता
हर लम्हे को।
ना जाने,
क्या बुनता रहता मन ही मन में
एक वक़्त था
ना जाने कितने ही बच्चे,
उस बरगद के आँगन में खेला करते थे
लेकिन,
अब कोई ना आता,
सूना ही रहता है हरदम।
उस बूढ़े बरगद का आँगन।
बस वो है
और,
खामोशी है।
