STORYMIRROR

Anita Sharma

Others

2  

Anita Sharma

Others

बंद खिड़की

बंद खिड़की

1 min
449

 

तलबगार है ये बंद खिड़की 

उस शख्स के दीदार की 

जो वादा करके गया आने का 

अब हद्द हो चुकी इंतज़ार की।


गुज़रती हैं जब भी हवाएं यहाँ से 

दर्द की आहट उठ जाती है 

चरमराती कराहती हैं बहुत 

ये खिड़की बहुत चिल्लाती है।


जाम हो चुके कब्जे इसके 

झुँझलाते किटकिटाते से 

उन यादों के झरोखों से 

तेरी कोई हूक सी उठ जाती है।


आजा की रंग फीके न हो जाएँ 

खुलने को आज भी बेताब ये खिड़की 

रोशनी भी गुज़रने नहीं देती 

कैसी ज़िद पर अड़ी है ये खिड़की।


कब आकर खटखटाओगे 

कब फिर सतरंगी सपने सजाओगे 

आजाओ की आस में परेशान 

तलबगार तेरी ये बंद खिड़की।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन