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Kavita Verma

Others

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बिरवे से वृक्ष

बिरवे से वृक्ष

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जब उसने समझना सीखा

रोपा एक छोटा बिरवा

उसकी उसकी आँखों में

जिस पर उगी

उमंगों की कोपलें

चाहतों की कलियाँ

सपनो के फूल

और सफलताओं के फल

खूब फूला खूब फला

फैलता गया

ऊपर आसमान में

जमीन के नीचे दूर दूर

बिरवा रोपने वाले हाथ

उसे फैलता देख अघाती आँखें

खुश थीं लेकिन अब महसूस करने लगीं

थम जाना चाहिए इस फैलाव को

इसके पहले कि यह बिखराव बने

उमंगों चाहतों सपनों ने

थमना कब सीखा है?

आसमान ने कहाँ तय की है कोई सीमा

असीमित को कब बाँधना है

कितने लोग जान पाते हैं

कहाँ समझ पाते हैं कि

इस फैलाव के नीचे

उन्हें रोपने वाले हाथ उनकी आँखें

तरस रही हैं

उनके प्यार की धूप को।


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