भीगी धरती
भीगी धरती
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जब बरसती है घनघोर काली घटायें
तपते हुए मैदान पर
भीग जाता है धरती का तन-मन
तब सौंधी गंध बिखेरती है धरा।
बरसात से
सावन में भीगो जाते है
नदियों के तट और
भीगा धरती का तन।
रेगिस्तन में बरसात में
भीगी धरती
सब के लिए सौंप देती है
अपनी कोख।
बस जाती है मचानों की दुनिया।
खेत-खलिहानों में
दूर तक फैल जाती है
हरियाली चादर, बरसात से
खेतों में भर आती है
फसल की देह
दाना गदराया देख
लहलहाते खेतों में
मुस्कुराती है
धरती माँ ।
