भारतीय मीडिया का हाल
भारतीय मीडिया का हाल
मेरी बेचैनी मैं समझूं ,या मेरा मालिक समझता है
कोई गोदी समझता है, कोई चाटुकार कहता है
क्या समझूँ खुद को मैं, कोई दलाल समझता है
बेचैनी दिल में कैसी है, ये भारत कहाँ समझता है
मेरी बेचैनी मैं समझूं ,या मेरा मालिक समझता है
उठाना हैं जिन मुद्दों को,उन्हें हम नहीं उठा सकते
जरूरी देश हित में हो ,बहस उस पर न कर सकते
साथ देना हैं हुक्मरानों का, वगावत कैसे कर देते
ये व्याकुलता कैसी है, मजबूरी कोई न समझता है
मेरी बेचैनी मैं समझूं ,या मेरा मालिक समझता है
हमें निष्पक्ष रहना था, अपारदर्शी बन बैठे
डरे हम हुक्मरानों से,अपनी वेबाकी खो बैठे
था ऐतवार लोंगों का, हम रूश्वाई कर बैठे
हैं स्तम्भ चौथा हम,खुद को सरकारें समझ बैठे
जिन्हें समझा था अनाड़ी,वो करिश्मा कर बैठे
हम मगरूर थे खुद में, वो बायकोट कर बैठे
फ़र्ज़ क्या है हमारा, समझ कुछ नहीं आता है
मेरी बेचैनी मैं समझूं ,या मेरा मालिक समझता है
ना बनो पिट्ठू सरकारों के,ये तो आती जाती है
आवाज बनो कमजोरों की,जो उठ नहीं पाती हैं
निर्भीक रहो,निष्पक्ष रहो, ये जिन्दगी न फिर आती है
आस न किसी की बचती है,तब याद तुम्हारी आती है
जब काल का चक्र चलता है, राज कोई न छुपता है
मेरी बेचैनी मैं समझूं ,या मेरा मालिक समझता है।
