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मिली साहा

Children Stories

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मिली साहा

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बचपन के खेल निराले

बचपन के खेल निराले

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बचपन के खेल निराले,

सीधे, सच्चे और मस्ती वाले,

अपने तसव्वुर में बना लेते दुनिया

जिसके उपवन में बस खुशी के प्याले।।


तितलियों के पीछे भागना,

वृक्ष, फूल पत्तियों से बातें करना,

दोस्तों के साथ बना मिट्टी का घरौंदा,

ऐसे खुश होते जैसे मिला कोई खज़ाना।।


अजब गज़ब खेल रचाना,

सब छोड़ अपने मन की करना,

पिट्ठू, पोषम-पा, खो-खो, मारम पिट्टी,

अक्कड़ बक्कड़ पर खिलखिलाकर हँसना।।


काग़ज़ से एरोप्लेन बनाना,

एक साथ मिलकर कैरम खेलना,

हार-जीत की किसी को फ़िक्र न रहती,

मकसद बस दोस्तों के संग समय बिताना।।


खुद हाथों से पतंग बनाना,

वो खाली डब्बे, टायर से खेलना,

वो घूमते हुए लट्टू को हाथ में लेकर,

मुंह बना बना कर, एक दूसरे को चिढ़ाना।।


कंचों की रहती भरमार,

गुलेल से करते फलों पर वार,

गिलहरियों को मूंँगफली खाते देख,

बिना थकान उनकी नकल करते सौ बार।।


पेड़ों पर बनाकर झूला,

झूलते, आसमां देखते नीला,

रात को आंगन में बैठ, तारे गिनते,

सच में, खेल है बचपन का, बड़ा रंगीला।।


छुपन छुपाई बड़ी निराली,

वो पकड़म पकड़ाई वो रेलगाड़ी,

लंगडी खेलकर भी थकते नहीं थे पांव,

ऐसे ऐसे खेलों से भरी दुनिया बचपन वाली।।


चेन, लंदन खेल सुहाना,

खेलने का, बस चाहिए बहाना,

चिड़िया उड़ में उड़ा देते हाथी को भी,

बचपन था वो सेहतमंद खेलों का खज़ाना।।


वो गुड्डे गुड़ियों का खेल,

अनगिनत रंगों का करना मेल,

टिपी टिपी टॉप वाॅट कलर यू वांट में,

रंगों की पहचान कराती थी, खेलों की रेल।।


अंतराक्षरी सबके साथ,

गाने गाते एक से एक खास,

हुआ करता था, कितना रोमांचकारी,

वो दौड़ लगाना सुबह शाम दोस्तों के साथ।।


दोस्तों संग वो आँख मिचौली,

काग़ज़ के टुकड़ों से खेलना होली,

मिट्टी के बर्तन मिट्टी के खिलौनों के खेल,

दुनिया की वो, दादी नानी की कहानी वाली।।


कितनी मासूम वो दुनिया,

छोटे-छोटे खेलों में थी खुशियाँ,

न मोबाइल था तब न सोशल मीडिया,

फिर भी मन के आंगन में खिलती कलियांँ।।


छुप गए हैं वो खेल कहाँ,

मोबाइल का हो गया ये जहाँ,

बच्चे घरों में कैद हुए हैं चारदीवारी में,

मोबाइल में खेल खेलते मोबाइल की दुनिया।।


बच्चे भूल गए हैं मैदान,

सेहतमंद खेलों से हैं अनजान,

तन मस्तिष्क पे हो रहा जिसका असर,

यह किस और हो रहा युवा पीढ़ी का रुझान।।



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