अगर शब्दों के पंख होते
अगर शब्दों के पंख होते
मन की अतल गहराइयों में
दबी हुई भावनाएं---
टूटी फूटी , कुचली हुई,
मार दी गई,
जमाने के खौफ से----
दबा दी गई--- कामनाएं,
जब और गहरे----
और गहरे---
दबा दी जाती हैं----
जब सह नहीं पाती हैं---- घुटन,
तो, उफन जाती हैं,तब---
खुद-ब-खुद ढलने लगती है---
लेखनी--- लगाकर शब्दों के पंख--
फैलता जाता है फिर---
कागज पर दर्द----
बन जाती है फिर-- कोई नज्म,
रच जाती है कोई कविता,
आकार लेती है---
कोई कहानी,
मन में दबी भावनाओं को,
लग जाते हैं तब--- शब्दों के पंख,
विस्तार लेती है फिर---
कल्पना की उड़ान,
रचती है कलम खुद-ब-खुद,
कोई कविता महान,
दिल से निकली---
भावों की निर्झरिणी
लगा देती है फिर शब्दों को पंख
और यह मन उन शब्दों के साथ
निकल पड़ता है---
दूर बहुत दूर-------
