अचानक कुछ अजनबी से तुम
अचानक कुछ अजनबी से तुम
1 min
640
रात के साये फिर गहराने लगे हैं
नींद है की सिसकिओं की लड़ी सी सुबकती जा रही है
रौशनी चाँद भी बेरौनक सा लगता है मुझे
करवटे हैं की खुद ही बदलती जा रहीं हैं
कहते थे परछाई हो मेरी
भरी धुप मैं फिर क्यों मिटती जा रही हैं
सिमटे से बैठे हैं हम आज अपने लिहाफ में
हाथ बढ़ाये भी तो क्या छूने के लिये
अजनबियत का एहसास जलाता बहुत है
तुम्हारी दोस्ती सच थी
या अब यूं अजनबी हो जाना
पहले दोस्ती मे लुटे अब अजनबियत में
अचानक कुछ अजनबी से तुम
