आत्मकथ्य
आत्मकथ्य
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मैं लालबत्ती
जब जब जलती
तुम्हें रोकती अंधी दौड़ से
तुम रूक कर मुझे सुनते
तो ठीक
वरना अपनी राह चलकर
ही पछताते।
मेरे प्रयास तुम्हें बचाने के होते
तुम मुझ पर दोष डाल चलते
जिंदगी से कर मज़ाक
कारण बताते मुझे
मैं लालबत्ती
कुछ नहीं होगा
यूँ ही तेज दौड़ने से
सिग्नल तोड़ खुद तो परेशान
दूसरों को भी परेशानी में
तुम डालोगे।
कोई पहाड़ नहीं टूटता
कुछ पलों में
जिंदगी गँवा सकते हो तुम
ना समझी होती तुम्हारी
कारण बन जाती
मैं लालबत्ती
