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anuradha chauhan

Others

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आज जीने के लिए

आज जीने के लिए

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आज जीने के लिए,

इक शिखण्डी चाहिए।

काल को जो ग्रास ले,

शक्ति चण्डी चाहिए।


प्रीत की मूरत बनी,

पीती रही है गरल।

अँधेरों में डूबती,

रोती रहती अविरल।

भस्म सारा दर्द हो,

लौ अखण्डी चाहिए।

काल को जो ग्रास ले,

शक्ति चण्डी चाहिए।


आज जीने के लिए,

इक शिखण्डी चाहिए।


खंड-खंड बिखरी सदा,

दिखा न कोई रास्ता।

पग-पग पे बबूल-थे,

मार्ग कँटक से भरा।

काट इन्हें फेंक दें,

महा चण्डी चाहिए।

काल को जो ग्रास ले,

शक्ति चण्डी चाहिए।


आज जीने के लिए,

इक शिखण्डी चाहिए।


दाँव पे हरदम लगी,

लाज नारी की सदा।

बैठे आँख मूँद के,

भीष्म से सभी यहाँ।

वार इन पे कर सके,

वो शिखण्डी चाहिए।

काल को जो ग्रास ले,

शक्ति चण्डी चाहिए।


आज जीने के लिए,

इक शिखण्डी चाहिए।


चीर हरण की पुकार,

कौन सुनता है भला।

आँख कान बंद करे,

मौन कान्हा ने धरा।

पाप को जो मार दे,

वो त्रिखण्डी चाहिए।

काल को जो ग्रास ले,

शक्ति चण्डी चाहिए।


आज जीने के लिए,

इक शिखण्डी चाहिए।


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