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Deepa Dingolia

Others

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Deepa Dingolia

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तपस्या

तपस्या

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आज बहुत सवेरे आ गयीं। घडी में भी सिर्फ पौने पाँच ही बजे हैं। अभी तो मैंने ढंग से शिवलिंग की सफाई भी नहीं की "-पंडित जी बोले।

"हाँ... राम-राम पंडित जी। आज जरा जल्दी जाना है। मेरे विद्यालय में आज बच्चों का कार्यक्रम है "- नेहा ने कहा।

शिवलिंग पर जल चढ़ा कर प्रसाद लेकर नेहा जल्दी से घर की ओर चल दी। आज सोमवार का व्रत था नेहा का। बस चाय पी कर माँ को दरवाजा बंद करने की आवाज लगाकर सीधा अपने विद्यालय की ओर निकल पड़ी।विद्यालय में सारे काम निबटा कर कुर्सी पर आ बैठी। भूखे रहने से सर में बहुत दर्द हो रहा था। कार्यक्रम की वजह से बहुत देर हो गयी थी। शाम को घर पहुंची। हाथ-मुहँ धो कर रसोई में पहुंची तो माँ ने बड़े प्यार से खाना परोसा। खाना खाकर उठी ही थी कि पड़ोस की ताई जी घर पर आयीं।

"नमस्ते ताई जी। कैसी हो "- कह कर नेहा ने ताई जो को अंदर कमरे में बिठाया। तभी माँ भी आ गयीं।

"आइये आइये भाभी। कैसी हैं आप ? बहुत दिनों के बाद आयीं " - माँ ने गले मिलते हुए ताई जी से कहा।

"बस समय ही नहीं मिलता। सोचा आज जरूर आपके पास होकर जाऊंगीं। बताओ कैसी हो तुम भी। नेहा की शादी का कुछ बना। आज तो वैसे भी इसका व्रत होगा सोमवार जो है। खैर नेहा बेटे तुम जितना पूजा -पाठ करती हो देखना तुम्हें पति भी योग्य ही मिलेगा "- ताई जी ने मुस्कुराकर नेहा और माँ को देखकर कहा।

 नेहा मुस्कुराकर चाय बनाने के लिए कमरे से निकल गयी।

"बस भाभी देखो क्या बनता है। एक जगह बात तो चलायी है। लड़का पढ़ा -लिखा है। बड़ी कम्पनी में मैनेजर है। बस अब एक-दूसरे को देखना ही बाकी है "- माँ ने कहा।

"तुम चिंता क्यों करती हो। सब ठीक होगा। नेहा जैसी लड़की तो किस्मत वालों को मिलती है। पढ़ी-लिखी,समझदार,खूबसूरत ,धार्मिक विचार ,शांत स्वभाव,सर्वगुण सम्पन्न बिटिया है हमारी। कोई बेवकूफ ही मना करेगा "-ताई जी उत्साहित हो कर कहती जा रहीं थीं।

नेहा चाय रख अपने कमरे में चली गयी।

माँ और ताई जी बातें करने में मशगूल हो गयीं।

"बस एक ही समस्या आ जाती है भाभी बार-बार। नेहा का शाकाहारी होना। नेहा तो माँस -मच्छी छू ही नहीं सकती और बनाने व खाने की तो बात ही नहीं उठती।अपनी पूजा-पाठ की बहुत पक्की है। बहुत तपस्या की है इसने अपनी पसंद का जीवन साथी पाने के लिए। लेकिन ज्यादातर पढ़े-लिखे लड़के अपनी सोसाइटी में उठ-बैठ के कारण खूब खाते-पीते हैं। उनके साथ नेहा का निर्वाह मुश्किल ही है "- माँ गहरी साँस छोड़ते हुए बोलीं।

"अरे परेशान न हों सब ठीक होगा। चलो अब चलती हूँ। बहुत देर हो गयी अब "- कहकर ताई जी चली गयीं।

"सुनो कल हमें दिल्ली जाना है। शर्मा जी ने लड़के वालों से बात की है। कल हम आपस में नेहा और विवेक को मिलवा देंगें और एक-दूसरे के परिवार से भी मिल लेंगें। तुम नेहा को बता दो कि कल विद्यालय नहीं जायेगी" - रात को पापा ने आकर माँ से कहा।

"ये बहुत अच्छी बात है। बस सब ठीक से हो जाए और बच्चे एक-दूसरे को पसंद कर लें "- माँ ने उत्साहित होते हुए कहा।


शाम को दोनों परिवार मंदिर में पार्क में एक-दूसरे से मिले। नेहा को विवेक ने देखते ही पसंद कर लिया। रिश्ता पक्का हो गया और विवाह के लिए दोनों पक्ष राज़ी हो गए। सब ने बधाई दी। नेहा की माँ बहुत ही खुश थीं। पंद्रह दिनों के बाद विवाह निश्चित हो गया। पापा ने शर्मा जी का शुक्रिया किया क्योंकि यह रिश्ता करवाने में उनकी भूमिका अहम थी।

"शर्मा जी आपका बहुत शुक्रिया। वैसे आपने विवेक से खाने-पीने और नेहा के शाकाहारी होने का बता दिया है न "- माँ ने चिंतित हो कर पूछा।

"अरे भाभी बेफिक्र रहें। सब बातें खोलकर कर लीं हैं। विवेक खुद भी शाकाहारी है। निश्चिन्त रहिये "-शर्मा जी ने हँसते हुए कहा।

"आपने यह कह कर मेरी और नेहा की सारी चिंताएं ही दूर कर दीं भाई साहब " - माँ ने ठंडी सांस भरते हुए कहा।

 पूरे रास्ते माँ व पापा बहुत ही खुश थे और शादी की तैयारियों के बारे में ही बातें करते रहे। नेहा भी मन ही मन बहुत खुश थी। रात को देर से घर पहुंचे।

सुबह सवेरे माँ ने सब को नेहा के रिश्ते और विवाह के बारे में फोन कर खबर सुनाई।पापा ने विद्यालय में भी खबर दी और नेहा के नौकरी छोड़ने के विषय में भी बता दिया सब से ज्यादा माँ प्रसन्न थीं।

आज नेहा की शादी थी। सब रिश्तेदार ,मित्र ,पड़ोसी विवाह स्थल पर पहुँचने लगे। बारात आ गयी। नेहा व विवेक का विवाह सभी के आशीर्वाद से भली प्रकार संपन्न हो गया। नेहा अपने ससुराल चली गयी। माँ व पापा भी अपने फ़र्ज़ से मुक्त हो गए थे तथा नेहा भी अपने नए जीवन की शुरुआत कर चुकी थी।


"नेहा आज शाम तैयार रहना। ऑफिस के गुप्ता जी के यहाँ खाने की दावत है हमारी"- ऐसा कह कर विवेक चले गए।

आलिशान मकान था विवेक का। विवेक का परिवार कानपुर में रहता था। घर में अकेले नेहा ही थी । सारा घर अपने हाथों से सजाया था उसने। घर में नेहा खूब पूजा-पाठ करती और पुरोहितों को भोजन भी कराती। दोनों बहुत खुश थे।रात को दोनों गुप्ता जी के यहाँ दावत पर पहुंचे।


"आइये आइये भाभी। बहुत -बहुत स्वागत है आपका हमारे यहाँ "- गुप्ता जी की पत्नी सुमन ने नेहा को गले लगाकर कहा।

"कुछ तो लीजिये विवेक भैय्या। ये ख़ास आपके लिए बनाया है और मसालों व तेल से चमक रही सब्जी सुमन ने विवेक की प्लेट में डाल  दी।आप तो कुछ ले ही नहीं रहे।अब हमारे हाथ का खाना अच्छा नहीं लग रहा।हाँ भई अब तो नेहा के हाथ का ही अच्छा लगेगा "- सुमन ने चुटकी लेते हुए कहा।

"ऐसी कोई बात नहीं है भाभी "- नेहा और विवेक दोनों ने एक साथ कहा।

सब अच्छा ही रहा। रात काफी हो गयी थी सुमन और गुप्ता जी से विदा ले नेहा और विवेक घर पहुंचे और सो गए।नेहा अपनी शादी से बहुत खुश थी। समय पँख लगा उड़ रहा था। ऑफिस के काम के कारण विवेक का ज्यादातर समय गुप्ता जी के यहाँ ही बीतता था। रात देर होने से विवेक रात का खाना अधिकतर गुप्ता जी के यहाँ से खा कर ही आता था। नेहा ने विवेक से कई बार जल्दी आने और रात का खाना एक साथ खाने को कहा। घर में रात का खाना बहुत समय से बना ही नहीं था।

माँ ने नेहा को समझाया कि -"तुम तो खाना खा लिया करो अगर विवेक को देर हो जाती है तो"।

तभी घंटी बजी। "अच्छा माँ मैं फोन रखती हूँ। विवेक आ गए हैं। "- कहकर नेहा दरवाजे की ओर भागी।

"बहुत देर लगा दी दरवाजा खोलने में। आज बहुत थक गया हूँ। तुम गाड़ी से सारा सामान ले आओ प्लीज़ "- कह कर विवेक कमरे में जा कर जल्दी ही सो गए।

गाड़ी से सारा सामान ला कर नेहा ने टेबल पर रखा तभी एक डिब्बा नीचे गिरा। नेहा ने उठाकर खोला तो उसे विवेक का गुप्ता जी के यहाँ रोज-रोज रात को जाने का माज़रा समझते देर न लगी। खुद को ठगा सा महसूस कर रही थी। लेकिन इसे उसने ईश्वर की मर्ज़ी जान स्वीकार कर लिया।

"आज रात का खाना हम साथ करेंगें। आप समय से घर पहुँच जाना। कोई बहाना नहीं चलेगा " - नेहा ने फोन पर विवेक से कहा।

"ठीक है। पर ऐसा क्या ख़ास बना रही हो ? "- विवेक के ताना मारते हुए नेहा से कहा।

"वो तो आने और खाने के बाद ही पता चलेगा "- नेहा ने हँसते हुए कहा।

विवेक घर पहुंचा और कपड़े बदल बड़ी उत्सुकता से खाने की टेबल पर पहुँचा और हँसते हुए बोला-"क्या खिला सकती हैं हमारी मैडम जरा देखें " और ढकी प्लेट को हटाया।

प्लेट में खाना देख विवेक के पसीने छूटने लगे। सामने नेहा को देख उसका गला सूख गया। उसकी जुबान लड़खड़ा रही थी। नेहा के आँसूं बह रहे थे।

" मुझे माफ़ कर दो नेहा। मैं तुम्हारी भावना को ठेस नहीं पहुंचना चाहता था। लेकिन तुम्हें कैसे पता कि मैं और ये सब... तुमने हाथ भी कैसे लगाया...और बनाया कैसे ? "-विवेक ने शर्मिंदा होते हुए कहा।

"आप एक बार मुझे अपनी पसंद बता देते तो इतने सालों तक आप को गुप्ता जी के यहाँ खाना खाने न जाना पड़ता। मेरा धर्म -विश्वास अपनी जगह और आपके प्रति मेरा कर्त्तव्य अपनी जगह है। मेरे कारण आपको अब खाने के लिए कहीं नहीं जाना पड़ेगा "- नेहा रोते हुए बोली।विवेक ने नेहा को गले लगाया और हमेशा एक-दूसरे के साथ समय बिताने का वादा किया।

प्लेट में सजी बोटियाँ अपनी जीत का जश्न मना रही थीं और नेहा की खुद के व शुद्ध शाकाहारी पति पाने की तपस्या भंग हो चुकी थी।



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