मीठी आस
मीठी आस
कई बार सुना है, माफ कर दो - माफी से आपके साथ सामने वाले का भी मन हल्का होता है लेकिन बहुत मुश्किल है माफ करना जब बात - किसी की लापरवाही से अपने किसी के खोने की हो।
शादी को 15 साल हो गए ,ना जाने कितने मंदिर व पंडितो के पास गए मगर जीवन में मां बनने की इच्छा अधूरी थी। लगभग सभी डॉक्टरों के पास गई मगर फिर भी मन किलकारी सुनने को तरसता रहा, लेकिन जो काम मुंबई दिल्ली और बेंगलुरु के डॉक्टर नहीं कर सके वह काम किया बिलासपुर में एक डॉक्टर ने ।
वहां मेरी बड़ी बहन रहती थी - बिलासपुर में एक मशहूर डॉक्टर जो लंदन से पढा़ई कर आई थी ।उसके पास जाकर फिर एक उम्मीद जगी और कुछ ही महीनों में , एक लंबे अरसे की अधूरी ख्वाहिश कहें या आस पूरी होने को थी। हर कोई मेरा बड़ा ध्यान रखता था।
सबके मन में डॉक्टर के प्रति आदर बढ़ गया । उसकी दवाइयां व बिना सलाह के मैं व मेरा परिवार कुछ नहीं करते थे यहां तक कि हमारा हर परिचित भी उसी डॉक्टर के पास जाने लगा। कुछ महीने मैं बहन के यहां रूकी। वह बहुत अच्छी तरह से मेरी देखभाल करती थी । सच में बड़ी बहन मां ही होती है । साथ में उसके दो बच्चे मुझे हर समय खुश रखते ,हर चीज खाने को कहते बिना कहे मेरी पसंद की चीजें बन जाती थीं। हर वक्त हंसाते ,कभी कहते लड़का होगा कभी कहते लड़की ,बहुत अलग था जीवन, उन नौ महीनों में हर पल ईश्वर का शुक्र अदा करती। देर से ही सही मगर अपनी औलाद तो दे दी ।
पति भी बच्चे के आने की खुशी में पहले से सुधर गए थे ,रात को जल्दी घर आ जाते थे ।दोस्तों के साथ नहीं बैठना, मुझे अपने आने वाले बच्चे के साथ बैठना है कहते। पति का एक ऑफिस बिलासपुर में था तो वह भी बहन के यहां आकर रुके थे ।आए दिन ननदें व सासू मां कुछ ना कुछ भेजतीं। वैसे भी ये एक ही भाई हैं और दो इनकी बहनें हैं , बहनें कम दोस्त ज्यादा । यही प्यार तो परिवार में इंसान की ताकत होती है।अब 8 महीने भी कट गए बड़ी खुशी से मेहमान के आने से पहले ही घर सज चुका था मुझे तो लड़का पसंद था और इनको लड़की।
कुछ भी हो अपना बच्चा तो प्यारा ही लगता है । "तुम सुंदर हो" हमेशा यही कहते "तुम्हारी तरह सुंदर लड़की हो"। वैसे यह तो फुटबॉल प्लेयर हैं इनकी तरह लड़का हो मैं कहती, कुछ मेरे गुण हों तो कभी लगता कुछ इनके ,तो वह बेस्ट होगा।न जाने कितनी कल्पना हमने कर ली। नाम की किताबें लाकर रखी, रंग-बिरंगे खिलौने, कई कपड़े, चाहने वालों ने पहले ही लाकर दिये।
कभी-कभी लगता मुझे शॉपिंग का मौका ही नहीं मिलेगा और लंबे समय से मैं शॉपिंग के लिए निकल भी नहीं पाती थी बस अब 2 दिन। पंडित जी से मुहूर्त निकलवा लिया अब मेरी डाक्टर - डाक्टर कम फैमिली मेंबर ज्यादा बन गई थी हमारी।
फिर हमें एक बहुत सुंदर सा लड़का हुआ, खुशी का ठिकाना नहीं था। हजार बार छूकर मै देखती। इतने सालों के दर्द भूल गयी ,एक मीठी आस पूरी हो गई थी ।कुछ दिनों तक तो मैं बच्चेको छोड़ती
ही नहीं थी लगता मेरी गोद मे ही रहे।हर कोई ईश्वर का लाख-लाख शुक्रिया करता उसे देख कर सब के आंसू आ गए खुशी के ,पूरे शहर में मिठाइयां बांटी गईं, बड़ी धूमधाम से नामकरण हुआ। मैं घर पहुंची तो घर सजा हुआ था रंग बिरंगे फूल व गुब्बारों से ,सब कॉलोनी वाले आए थे ।ढोल बज रहा था पूरा घर खुशियों से महक रहा था।ये सब किसी कल्पना से कम नहीं था ।कितनी फोटो व वीडियो बनाए गए फेसबुक व्हाट्सएप में मानो हमारा हीरो छाया हुआ था ।सब कुछ अच्छा चल रहा था।
2 महीने बाद इंजेक्शन लगवाने हमें बिलासपुर जाना पड़ा इन दो महीनों में बच्चा और सुंदर सरदार बन गया था। इसी बीच छोटी-छोटी परेशानियां भी हुईं ,डॉक्टर से फोन में बातें होती थीं। इंजेक्शन के बाद उसकी तबीयत ज्यादा खराब हो गई इतनी कि हम उसे एडमिट करना पड़ा।
वहां हर दिन हजारों लोग आते हैं कई बच्चे पैदा होते हैं - वहां के लिए यह सब सामान्य बातें थीं मगर हमारे लिए बहुत बड़ी बात थी ।
सुबह से बच्चे ने दूध भी नहीं पिया, हम बार-बार डॉक्टर से कहते और आखिरी डॉक्टर ने बताया नर्स ने गलती से इंजेक्शन दूसरा लगा दिया है और वह एक साथ ट्रे में दो बच्चों के लिए इंजेक्शन लाई थी। रूम नंबर वन और इलेवन और ज्यादा पावर कंजप्शन लग गया है । हम ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं जल्दी ठीक हो जाएगा । डॉक्टर की बात सुनने की देर थी और मैं बेहोश हो गई सब रोने लगे क्या हो गया सब डॉक्टर को चिल्लाने लगे मगर हमारा बच्चा नहीं रहा कुछ घंटों में वह हमें छोड़कर चला गया।
एक नर्स और डॉक्टर की गलती के कारण हम पर पहाड़ टूट पड़ा। हम बहुत गुस्से में थे लगा डॉक्टर पर केस कर दें, हॉस्पिटल पर केस कर दें ऐसा करने से लाइसेंस रद्द हो जाता मगर डा हमारी एक मित्र व शुभचिंतक बन गई थी, वह खुद प्रेग्नेंट थी कैसे उसे ।।।।कैसे करें?
हमारे पास किसी चीज की कमी नहीं थी मगर आई हुई औलाद भी चली गई इस दुख से उभरने के लिए परिवार को मुझे बहुत वक्त लगा ।फिर हमने सोचा केस तो नहीं करेंगे क्योंकि ईश्वर ही नहीं चाहता था ।डा ने कई लोगों को खुशियां दी इस डॉक्टर ने हजारों को जीवन बदला है कई बार माफी मांग चुकी थी। नर्स की नौकरी चली गई। मगर कुछ दिनों बाद फिर हम प्रेग्नेंट हो गए ।कुछ दिनों तक तो विश्वास ही नहीं हुआ ।फिर एक नई उम्मीद जाग गई मगर डर भी था।मुझे अपनी पहले वाली ही डॉक्टर पसंद थी ।किसी और डॉक्टर पर विशवास नहीं था । अब किसी और डॉक्टर के पास जाना नहीं चाहती थी । फिर हम उसी डॉक्टर के पास गए। मेरी देखभाल वह अपने हाथों से करती ,छोटी-छोटी चीजें भी खुद ही करती यहां तक कि नर्स के काम भी, खासकर मेरे साथ।
सब कुछ अच्छा रहा कई बार सोनोग्राफी हुई कई छोटी-छोटी परेशानियां कुछ जानकारी व देखभाल पहले की अपेक्षा मुझे ज्यादा हो गई थी।कभी-कभी डर भी लगता था मगर फिर सब कुछ वाहेगुरु पर छोड़ दिया ,कई जगह अरदास करवाती ,रोज सुबह सुखमनी पढ़ती थी ।मुझे पता था इस बार ईश्वर कुछ और अच्छा करेंगे ।हमें जुड़वा बच्चे हुए एक लड़का एक लड़की। हमारी फैमिली कंप्लीट हो गई वैसे मेरी बड़ी बहन के भी दो जुड़वां बच्चे हैं ,दो लड़के।
आज हम सब बहुत खुश हैं ।बच्चे पूरी तरह स्वस्थ हैं ,हर दिन नई-नई हरकतें व तोतली जुबान से कई मीठी बातें करते हैं। बहुत खुशी होती है। परिवार को उठते ही उनको देखने की आदत है ।कभी दादी उन्हें गार्डन ले जाती तो दादू गुरुद्वारे, कभी पापा मॉल तो मम्मी स्कूल छोड़ने जाती है।आज दोनों 10 साल के हो गए हैं ।डॉक्टर की बेटी भी उसी स्कूल में है, हम बिलासपुर शिफ्ट हो गए, कई बार मिलना होता है। और लगता है कभी-कभी गलती अनजाने में होती है, लोगों को माफ करना चाहिए जैसे हमने किया । बहुत मुश्किल था, चाहते तो लाखों रुपए वसूलते डॉक्टर का लाइसेंस रद्द करवाते लेकिन वाहेगुरु ने ऐसा करने की अनुमति ही नहीं दी या यूं कहो दिल गवाही नहीं देता किसी को सजा दूं।
आज क्षमा दिवस है ,अपनी कहानी याद आ गई। सच में दूसरों को *क्षमा* करना चाहिए।
जैन धर्म का पर्व है खास मगर इसे सब को अपनाना चाहिए।जब हम दूसरों को माफ करते तो शायद इसमें भी हमारी भलाई छुपी होती है।
