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प्रेम का त्याग
प्रेम का त्याग
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© Mahesh Dube

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जसवंत सुजानगढ़ राज्य का घोषित बागी था। राजा गुमानसिंह की आँख की किरकिरी पर प्रजा की आँखों का तारा। शासन का धन लूटकर गरीब प्रजा की मदद करना ही जिसका धर्म था। राजा गुमानसिंह ने जसवंत को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने पर भारी इनाम की घोषणा कर रखी थी पर जनता की सहानुभूति और जसवंत की चतुराई से वे आजतक असफल ही रहे। यह बात कोई नहीं जानता कि परम आदरणीय साधु बाबा परमानंद ही जसवंत हैं। दिनकर धर्म कर्म के कामों में डूबे रहने वाले बाबा जी जब रात को खतरनाक डाकू जसवंत बनते तो केवल उनकी अंतरात्मा ही इसकी गवाह होती। बचपन से ही जसवंत आन का पक्का और जुबान का सच्चा था। वह जिस स्वर्णरेखा को दिलोजान से चाहता था वह घरवालों के दबाव में आकर शमशेर सिंह से विवाह करने पर विवश हुई, जो शासन में उच्च पद पर थे। बेचारी विदाई के दिन अपने प्रेम घरौंदे कालका माई के मंदिर परिसर में जसवंत के गले लगकर फूट फूट कर रोई पर जसवंत की आँखें शुष्क ही रहीं। दूसरे दिन से ही जसवंत ने अन्याय के खिलाफ लड़ना अपना जीवन ध्येय बना लिया। अब तो उसका जीवन और रूप रंग सब मानो बदल गया है। यहां तक कि पुलिस कप्तान शमशेर सिंह की धर्मपत्नी स्वर्णरेखा भी भांप नहीं पाती कि जिन बाबा जी से वह अपनी समस्याओं का हल पूछने आया करती है वे ही उसके पूर्व प्रेमी जसवंत है।

 

आज सुबह बाबा परमानन्द जी पूजा स्नान के उपरान्त ध्यानावस्था में बैठे थे कि स्वर्णरेखा की पालकी का आगमन हुआ। वह आते ही बाबा के चरण पकड़कर रोने लगी। पिछले दिनों सुजानगढ़ का शाही खजाना लूट लिया गया था और राजा गुमानसिंह ने पुलिस कप्तान पर इसकी तोहमत लगाते हुए दस दिनों में जसवंत को गिरफ्तार न करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी थी। क्रूर और अय्याश राजा गुमानसिंह अपनी इच्छापूर्ति के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए कुख्यात थे। अब बेचारे शमशेरसिंह सर का पसीना तलवों तक बहा रहे थे किन्तु जसवंत एक ऐसा छलावा था जो कभी पकड़ में आया ही नहीं। आज राजा साहब की दी समय सीमा में केवल चार दिन बचे हैं। स्वर्णरेखा अपने संकटमोचक बाबा परमानंद के चरणों में सर रखे फूट फूट कर रो रही है। इन चार दिनों में जसवंत नहीं पकड़ा गया तो शमशेर को मृत्युदंड मिलकर रहेगा और उसके प्राणधन का बाल भी बांका हुआ तो स्वर्णरेखा भला जी सकेगी? बाबा परमानन्द ने ईश्वर पर भरोसा रखने को कहकर उसे ढाढ़स बंधाया और जाने को कहकर खुद भारी पशोपेश में बैठे रहे। जिस स्वर्ण के तलवे में चुभा काँटा जसवंत की छाती में तलवार की तरह चुभता था क्या वो अपने हाथों से अपने हृदय में कटार घोंप लेगी और वो भी जसवन्त के ही कारण? जसवंत ने भोर होते होते कर्तव्य पथ निश्चित कर लिया।

 

अगली रात्रि शमशेर सिंह के शयन कक्ष में एक कागज लिपटा हुआ पत्थर आ गिरा जिसमें कोई गुप्त सूचना पढ़कर वे उद्वेलित हो उठे। आनन फानन में काली पहाड़ी पर स्थित मंदिर को घेर लिया गया जहां अकेला और निहत्था जसवंत खजाने सहित गिरफ्तार हो गया। घोड़े पर उसे बांधकर लाया गया और दूसरे दिन भारी जनसमूह के बीच उसे मृत्युदंड दिया गया। बेबस जनता की आँखों से आंसू बह रहे थे परन्तु चेहरे पर बलिदान और संतोष के भाव लिए जसवंत उस स्वर्णरेखा को देख रहा था जो प्रसन्नचित्त होकर भिखारियों को कपड़े और अनाज का दान कर रही थी

           

दूसरे ही दिन पालकी में भाँति भाँति के उपहार लादकर स्वर्णरेखा परमानंद जी के यहाँ पहुंची तो वे मिले ही नहीं। कोई नहीं जानता था कि वे कहाँ गायब हो गये। स्वर्णरेखा उनकी खड़ाऊं और कमण्डल ले आई और ईश्वर की प्रतिमा के पास रख दिया। अब भी पति पत्नी रोज इस खड़ाऊँ को माथे से लगाना नहीं भूलते।

 

 

 

 

 

प्रेम का त्याग

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