STORYMIRROR

Chitra Yadav

Others

2  

Chitra Yadav

Others

एक रोज़

एक रोज़

1 min
345


एक रोज़ अपने बारजे में

कुछ पौधे लगाए थे मैंने


कुछ रोज़ पहले उन पर कलियाँ मुस्कुराईं थींं

फिर झूमते खिलखिलाते फूल खिले

और मेरे तन्हा बारजे में

बहार आई थी ।


आज देखती हूँ इन्हें ,

बेहद उदास नज़र आते हैं ,

जिंदगी से खफ़ा हैं या शायद मुझसे

बेहद नाराज़ नज़र आते हैं

बेरंगत -बेनूर नज़र आते हैं ।


इन फूलों के भी कुछ,

ख़्वाब होते होंगे शायद ....

अलबत्ता डाली पर लटके हुए ही

सूख जाना किसको भायेगा भला....


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन