कहाँ खो गया इनका वसंत
कहाँ खो गया इनका वसंत
सबके तो जीवन में ख़ुशियाँ भर
देता है। पर आते -आते राह में
कहाँ खो गया इनका वसंत।
ये नन्हे- नन्हे बालक जो मात-
पिता संग फूल चुन लाते हैं,
और फिर माला उसकी बनाते हैं।
करते व्यापार वासंती फूलों का,
परन्तु वसंत को सदैव अपने
जीवन से दूर ही पाते हैं।
सबके तो जीवन में ख़ुशियाँ भर
देता है। पर आते -आते राह में
कहाँ खो गया इनका वसंत।
ये नन्हे- नन्हे बालक जो सब्जी,
भाजी, तरकारी बेचने में पालकों
का हाथ सदैव बँटाते हैं।
पर क्या कभी खुद भी उनका
स्वाद ज़रा भी चख पाते हैं।
या सिर्फ देखते ही रह जाते हैं।
सबके तो जीवन में ख़ुशियाँ भर
देता है। पर आते -आते राह में
कहाँ खो गया इनका वसन्त।
ये नन्हे-नन्हे बालक जो झाड़ू,
पोंछा, बरतन करने निकली माँ
की अनुपस्थिति में घर पूरा अपना
सम्हालते हैं। छुपम-छुपाई, गिल्ली-
डण्डा और झूले झूलने की उम्र में
ही पूर्ण वयस्क बन जाते हैं।
सबके तो जीवन में ख़ुशियाँ भर
देता है। पर आते -आते राह में
कहाँ खो गया इनका वसंत।
