आरोह पाऊसथेंब
आरोह पाऊसथेंब
सांज संध्या नभी पाहता एकांत बसूनी अलिंद।
आरोह पाऊसथेंब झेलूनी मन होते बेधुंद।।धृ।।
थंड सरी चा स्पर्श गारवा।
करी मनी उत्पन्न मारवा।
मोरपिसासासम थेंब बरसती भेटाया अरविंद।
आरोह पाऊसथेंब झेलूनी मन होते बेधुंद।।
इंद्रधनू पाहूनिया सप्तरंग।
रोमांचित करीती प्रेमरंग।
अपरिमित प्रेमछटा पाहुनी मनी उजळती कुरुंद।
आरोह पाऊसथेंब झेलूनी मन होते बेधुंद।।
रोहिणी कडकडून गर्जती।
भानावर येते तो परलोकी।
स्मरून हाती चुडा केरवा कंठ दाटूनी स्फुंद।
आरोह पाऊसथेंब झेलूनी मन होते बेधुंद।।
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शब्दार्थ -
अलिंद - घराच्या पुढील ओटा
मारवा - शास्त्रीय संगीतातील एक राग
अरविंद - कमळ
कुरुंद - माणिक, निल ही रत्ने बनणारा दगड
रोहिणी - वीज
केरवा - हिरवी जाड बांगडी
स्फुंद - हुंदके देऊन रडणे
